दीपावली 2025: जानिए लक्ष्मीपूजन का इतिहास, विधि, महत्व और संपूर्ण पूजाविधान

लक्ष्मीपूजन का इतिहास:
मान्यता है कि दीपावली के दिन श्रीविष्णु ने देवी लक्ष्मी सहित सभी देवताओं को राजा बलि के कारागार से मुक्त किया था। इसके बाद सभी देवता क्षीरसागर में जाकर विश्राम करने लगे। इसी कारण से इस दिन लक्ष्मीपूजन का विशेष महत्व माना जाता है।

लक्ष्मीपूजन की विधि:
सुबह स्नान के बाद घर की सफाई और देवपूजन किया जाता है। दोपहर में श्राद्ध और ब्राह्मण भोजन कराया जाता है। शाम के समय लता-पत्तियों से सजे मंडप में देवी लक्ष्मी, श्रीविष्णु और कुबेर की पूजा की जाती है।
चौरंग पर अक्षतों से अष्टदल कमल या स्वस्तिक बनाकर लक्ष्मीजी की मूर्ति स्थापित की जाती है। कलश स्थापना के साथ कुबेर की प्रतिमा रखी जाती है। पूजा में लवंग, वेलची, साखर और गाय के दूध से बने खव्य का नैवेद्य चढ़ाया जाता है। पूजा के बाद धने, गुड़, लाह्या और बत्तासे बाँटे जाते हैं। रातभर जागरण का भी विशेष महत्व होता है।
मान्यता है कि इस रात देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और वह घर चुनती हैं जहाँ पवित्रता, सदाचार, संयम और भक्ति का वातावरण होता है।

लक्ष्मीपूजन का महत्व:
आम तौर पर अमावस्या को अशुभ माना जाता है, लेकिन दीपावली की अमावस्या अत्यंत शुभ और मंगलदायक होती है। यह दिन आनंद और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

लक्ष्मी प्रार्थना:
लक्ष्मीजी के समक्ष अपने वर्षभर के लेखाजोखा रखकर प्रार्थना की जाती है —
“हे माँ लक्ष्मी, हमने आपके आशीर्वाद से प्राप्त धन का उपयोग अच्छे कार्यों में किया है। हमारे खर्च पर आपकी कृपा बनी रहे और आने वाला वर्ष भी सुख-समृद्धि से भरा हो।”

आध्यात्मिक महत्व:
लक्ष्मी और सरस्वती की संयुक्त प्रार्थना से मनुष्य के भीतर की अहंभावना कम होती है और विनम्रता तथा आंतरिक शांति प्राप्त होती है।

श्री लक्ष्मी-कुबेर पूजाविधान:
पूजन की प्रक्रिया में आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र, गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, फल, तांबूल, आरती और प्रार्थना शामिल हैं। पूजा के अंत में देवी को नमस्कार और प्रदक्षिणा कर मंत्रपुष्पांजली अर्पित की जाती है।

आवाहन (आमंत्रण)

मंत्र:
महालक्ष्मि समागच्छ पद्मनाभपदादिह ।
पूजामिमां गृहाण त्वं त्वदर्थं देवि संभृताम् ।।

अर्थ:
हे महालक्ष्मी! श्री विष्णु के चरणकमलों से यहाँ पधारो और तुम्हारे लिए समर्पित इस पूजन को स्वीकार करो।

उजवे हाथ में अक्षत (चावल के दाने) लें।
(हर बार अक्षत अर्पित करते समय मध्यमा, अनामिका और अंगूठे को साथ मिलाकर अर्पित करें।)

मंत्र:
श्री लक्ष्मीकुबेराभ्यां नमः । आवाहयामि ।।
(फिर हाथ जोड़ें।)


आसन

मंत्र:
श्री लक्ष्मीकुबेराभ्यां नमः । आसनार्थे अक्षतान् समर्पयामि ।।
(श्री लक्ष्मी-कुबेर के चरणों में अक्षत अर्पित करें।)

अर्थ:
हे लक्ष्मी! तुम कमल में निवास करती हो, कृपा करके इस कमल में विराजमान होकर मेरी पूजा स्वीकार करो।
(यदि पूजा के लिए चित्र हो तो उस पर फूल या तुलसी पत्र से जल छिड़कें। मूर्ति या प्रतिमा हो तो उसे थाली या ताम्बे के पात्र में रखकर पूजा प्रारम्भ करें।)




पाद्य (पांव धोने का जल)

मंत्र:
श्री लक्ष्मीकुबेराभ्यां नमः । पाद्यं समर्पयामि ।।
(दाएं हाथ से चम्मच भर जल देवी के चरणों में अर्पित करें।)

अर्थ:
यात्रा के सारे श्रम दूर हों, इस हेतु गंगाजल मिश्रित और पवित्र मंत्रों से अभिमंत्रित जल से मैं आपके चरण धोने हेतु यह जल अर्पित करता हूँ।




अर्घ्य (सम्मान स्वरूप जल)

मंत्र:
श्री लक्ष्मीकुबेराभ्यां नमः । अर्घ्यं समर्पयामि ।।
(बाएं हाथ में चम्मच भर जल लें, उसमें गंध, फूल और अक्षत मिलाकर दाएं हाथ से देवी के चरणों में अर्पित करें।)

अर्थ:
हे महालक्ष्मी! जो भक्तों पर उपकार करने वाली, पाप नाशिनी और पुण्य देने वाली हैं — ऐसी तीर्थजल से किया गया यह अर्घ्य आप स्वीकार करें।




आचमन (पान हेतु जल)

मंत्र:
श्री लक्ष्मीकुबेराभ्यां नमः । आचमनीयं समर्पयामि ।।
(दाएं हाथ से जल देवी के चरणों में अर्पित करें।)

अर्थ:
हे जगदम्बे! कपूर और अगरु से सुगंधित शीतल जल मैं आपको आचमन हेतु अर्पित करता हूँ।




स्नान

मंत्र:
श्री लक्ष्मीकुबेराभ्यां नमः । स्नानं समर्पयामि ।।
(दाएं हाथ से जल अर्पित करें।)

अर्थ:
हे महालक्ष्मी! कपूर और अगरु से सुगंधित सभी तीर्थों से लाया गया यह जल स्नान के लिए ग्रहण करें।




पंचामृत स्नान

मंत्र:
श्री लक्ष्मीकुबेराभ्यां नमः । पंचामृतस्नानं समर्पयामि।
तदन्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि ।।
(दूध, दही, घी, मधु और शक्कर मिलाकर देवी को अर्पित करें। उसके बाद शुद्ध जल से स्नान कराएँ।)

अर्थ:
हे देवी! दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से युक्त यह पंचामृत स्नान मैं आपको अर्पित करता हूँ।




गंध स्नान

मंत्र:
श्री लक्ष्मीकुबेराभ्यां नमः । गंधोदकस्नानं समर्पयामि ।।
(जल में चंदन मिलाकर देवी को अर्पित करें।)

अर्थ:
कपूर और इलायची से सुगंधित यह चंदनयुक्त जल मैं स्नान के लिए आपको अर्पित करता हूँ।




महाअभिषेक

(अपने सामर्थ्य के अनुसार श्रीसूक्त या देवीसूक्त से अभिषेक करें।)
फिर मूर्ति या चित्र को साफ करके मूल स्थान पर स्थापित करें और आगे की पूजा करें।




वस्त्र अर्पण

मंत्र:
श्री लक्ष्मीकुबेराभ्यां नमः । वस्त्रोपवस्त्रार्थे कार्पासनिर्मिते वस्त्रे समर्पयामि ।।
(कपास का वस्त्र देवी को अर्पित करें।)

अर्थ:
हे देवी! सातत्ययुक्त, रेशों से निर्मित, कला से सुसज्जित और शरीर को अलंकृत करने वाले इन श्रेष्ठ वस्त्रों को धारण करें।




कंचुकीवस्त्र (चोली या साड़ी)

मंत्र:
श्री लक्ष्म्यै नमः । कंचुकीवस्त्रं समर्पयामि ।।
(उपलब्धता अनुसार साड़ी या चोली अर्पित करें।)

अर्थ:
हे विष्णुवल्लभे! मोतियों से सुशोभित, मनोहर और अमूल्य यह वस्त्र (चोली) मैं आपको अर्पित करता हूँ।




गंध (चंदन)

मंत्र:
श्री लक्ष्मीकुबेराभ्यां नमः । विलेपनार्थे चंदनं समर्पयामि ।।
(चंदन लगाएँ।)

अर्थ:
हे देवी! मलय पर्वत से उत्पन्न, नागों द्वारा संरक्षित और अत्यंत शीतल-सुगंधित इस चंदन को स्वीकार करें।




हळद-कुंकू (हल्दी-कुमकुम)

मंत्र:
श्री लक्ष्मीकुबेराभ्यां नमः । हरिद्रां कुंकुमं समर्पयामि ।।
(हल्दी और कुमकुम अर्पित करें।)

अर्थ:
हे ईश्वरी! मैं तुम्हें यह हल्दी, कुमकुम, अंजन, सिंदूर और सौभाग्यदायक सामग्री अर्पित करता हूँ।




आभूषण (अलंकार)

मंत्र:
श्री लक्ष्मीकुबेराभ्यां नमः । अंलकारार्थे नानाभरणभूषणानि समर्पयामि ।।
(उपलब्धता अनुसार गहने अर्पित करें।)

अर्थ:
हे देवी! रत्नजड़ित कंगन, बाजूबंद, कर्णफूल, हार, पायल और मुकुट जैसे अलंकार धारण करें।




पुष्प (फूल अर्पण)

मंत्र:
श्री लक्ष्मीकुबेराभ्यां नमः । पूजार्थे ऋतुकालोद्भवपुष्पाणि तुलसीपत्राणि दुर्वांकुरांश्च समर्पयामि ।।
(फूल, तुलसी, दूर्वा आदि अर्पित करें।)

अर्थ:
हे लक्ष्मी! नंदनवन के सुगंधित और मधुमक्खियों से युक्त पुष्पों का यह संग्रह आप स्वीकार करें।

धूप (अगरबत्ती/धूप अर्पण)

मंत्र:
श्री लक्ष्मीकुबेराभ्यां नमः । धूपं समर्पयामि ।।
(अगरबत्ती या धूप जलाकर देवी को दिखाएँ।)

अर्थ:
हे देवी! अनेक वृक्षों के रस से उत्पन्न सुगंधित धूप, जो देवता, दानव और मनुष्यों सभी को आनंद देने वाली है — वह धूप मैं आपको अर्पित करता हूँ।




दीप (प्रकाश अर्पण)

मंत्र:
श्री लक्ष्मीकुबेराभ्यां नमः । दीपं समर्पयामि ।।
(दीया या आरती का प्रकाश देवी को दिखाएँ।)

अर्थ:
हे देवी! सूर्य मंडल, चंद्रमा और अग्नि के तेज का स्रोत जो है, उसी तेजस्वी भावना से यह दीपक मैं भक्तिभाव से आपको अर्पित करता हूँ।




(अब तुलसीपत्र या बेलपत्र दाएं हाथ में लेकर उस पर जल डालें। फिर उस जल को नैवेद्य (भोग) पर छिड़कें। तुलसी का पत्ता हाथ में ही रखें और देवी को नैवेद्य दिखाते हुए आगे का मंत्र बोलें।)




नैवेद्य (भोग अर्पण)

मंत्र:
श्री लक्ष्मीकुबेराभ्यां नमः । नैवेद्यार्थे एला-लवंग-शर्करादि-मिश्र-गोक्षीर-लड्डुकादि-नैवेद्यं निवेदयामि ।।
प्राणाय नमः । अपानाय नमः । व्यानाय नमः । उदानाय नमः । समानाय नमः । ब्रह्मणे नमः ।।

(हाथ में रखे तुलसीपत्र देवी के चरणों में अर्पित करें। फिर प्रत्येक नाम के साथ जल अर्पित करें।)

मंत्र:
श्री लक्ष्मीकुबेराभ्यां नमः । नैवेद्यं समर्पयामि ।।
मध्ये पानीयं समर्पयामि ।
उत्तरापोशनं समर्पयामि ।
हस्तप्रक्षालनं समर्पयामि ।
मुखप्रक्षालनं समर्पयामि ।
करोद्वर्तनार्थे चंदनं समर्पयामि ।।

अर्थ:
हे देवी! स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल को धारण करने वाले अन्न से निर्मित यह सोळा प्रकार के नैवेद्य (भोग) मैं आपको अर्पित करता हूँ। कृपा कर इसे स्वीकार करें।




फल (फलों का अर्पण)

मंत्र:
श्री लक्ष्मीकुबेराभ्यां नमः । मुखवासार्थे पूगीफलतांबूलं समर्पयामि ।।
(पानी चम्मच में लेकर सुपारी या विडे पर छिड़कें।)

अर्थ:
हे देवी! मैं यह फल आपको समर्पित करता हूँ ताकि प्रत्येक जन्म में मुझे श्रेष्ठ फलों की प्राप्ति हो। क्योंकि इस सृष्टि में फल ही कर्म का परिणाम होते हैं, अतः इन फलों के अर्पण से मेरे मनोरथ पूर्ण हों।




तांबूल (पान अर्पण)

अर्थ:
हे देवी! मुख को सुगंधित और सुंदर बनाने वाला, अनेक गुणों से युक्त, पाताल से उत्पन्न यह पान मैं आपको अर्पित करता हूँ।




आरती

मंत्र:
श्री लक्ष्मीकुबेराभ्यां नमः । महानीरांजनदीपं समर्पयामि ।।
(देवी की आरती करें।)

अर्थ:
हे देवी! चंद्रमा, सूर्य, पृथ्वी, बिजली और अग्नि — इन सब में जो तेज है, वह आपका ही रूप है। उस समस्त तेज को मैं इस दीप से आपको अर्पित करता हूँ।

कर्पूर आरती मंत्र:
कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम् ।
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि ।।

अर्थ:
कपूर के समान श्वेत, करुणा के साक्षात् रूप, संसार के सार, नागराज को हार के रूप में धारण करने वाले, जो सदा हृदय कमल में निवास करते हैं — ऐसे पार्वती सहित भगवान शिव को नमस्कार।




नमस्कार (प्रणाम)

मंत्र:
श्री लक्ष्मीकुबेराभ्यां नमः । नमस्कारान् समर्पयामि ।।
(देवी को प्रणाम करें।)

अर्थ:
हे देवी! जो इन्द्र आदि देवताओं की शक्ति हैं, जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश की भी शक्ति हैं — ऐसी मंगलमयी, सुखदायी आदि शक्ति रूपिणी देवी को मैं बारंबार नमस्कार करता हूँ।




प्रदक्षिणा (परिक्रमा)

मंत्र:
श्री लक्ष्मीकुबेराभ्यां नमः । प्रदक्षिणान् समर्पयामि ।।
(स्वयं के चारों ओर तीन बार परिक्रमा करें।)

अर्थ:
जो भी पाप इस जन्म या पिछले जन्मों में किए गए हों, वे प्रत्येक प्रदक्षिणा के साथ नष्ट हो जाएँ। हे जगदंबे! तू ही मेरा आश्रय है, तुझसे बढ़कर मेरा कोई रक्षक नहीं — कृपा कर मेरा संरक्षण करो।




मंत्रपुष्पांजलि (फूल अर्पण)

मंत्र:
श्री लक्ष्मीकुबेराभ्यां नमः । मंत्रपुष्पांजलिं समर्पयामि ।।
(गंध, फूल और अक्षत लेकर दोनों हथेलियों से देवी के चरणों में अर्पित करें।)

अर्थ:
हे विष्णुपत्नी लक्ष्मी! यह पुष्पांजलि स्वीकार करें और इस पूजन के योग्य फल मुझे प्रदान करें।




प्रार्थना (समापन स्तुति)

मंत्र:
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।

अर्थ:
हे देवी! जो समस्त प्राणियों में लक्ष्मी रूप से विराजमान हैं, मैं आपको बार-बार नमस्कार करता हूँ।
हे विष्णुप्रिये! जो भक्तों को वरदान देती हैं, मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ।
तुम्हारी पूजा से जो मुक्ति प्राप्त होती है, वह मुझे भी मिले।
हे धन-संपत्ति की अधिष्ठात्री लक्ष्मी और कुबेर देव! तुम्हारी कृपा से मुझे धन, समृद्धि और सुख की प्राप्ति हो।

महत्वपूर्ण टिप्स:

पूजा पवित्र वस्त्रों (धोती-उपरना) में करें।

पूजा स्थान स्वच्छ और सुवासित रखें।

तिजोरी, हिसाब-किताब की बही और व्यापार के उपकरणों की पूजा अवश्य करें।

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