नरकासुर वध की कथा और अभ्यंग स्नान का महत्व: जानिए नरक चतुर्दशी का असली अर्थ

दिवाली के पांच प्रमुख त्योहारों में से एक है नरक चतुर्दशी, जिसे नरकासुर वध दिवस भी कहा जाता है। इस दिन लोग प्रातःकाल सूर्योदय से पहले अभ्यंग स्नान करते हैं और ब्राह्मणों को भोजन तथा वस्त्र दान देते हैं।

📜 इतिहास

‘श्रीमद्भागवत पुराण’ के अनुसार प्राग्ज्योतिषपुर में नरकासुर नामक राक्षस अत्याचार करता था। उसने १६,००० राजकन्याओं को बंदी बना लिया था। भगवान श्रीकृष्ण ने सत्यभामा के साथ नरकासुर का वध किया और सभी राजकन्याओं को मुक्त किया। मरते समय नरकासुर ने वर मांगा कि इस दिन जो स्नान करेगा उसे नरक की पीड़ा न हो। तब से यह दिन नरक चतुर्दशी कहलाने लगा।

🌄 त्योहार का महत्व

इस दिन अभ्यंग स्नान, तिल तेल से दीप प्रज्वलन और पूजा से नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है। माना जाता है कि इस दिन वातावरण की दूषित लहरें समाप्त होती हैं और शुभ ऊर्जा का संचार होता है। यह दिन असुरों पर देवत्व की विजय का प्रतीक है।

🙌 पूजा विधि

ब्रह्ममुहूर्त में उठकर आघाड़ा पौधे से स्नान करना।

यमतर्पण कर अपमृत्यु से रक्षा का संकल्प लेना।

कारीट फल को पैर से कुचलकर नरकासुर वध का प्रतीक करना।

ब्राह्मणों को भोजन व वस्त्र दान करना।

संध्या समय दीपदान और शिव पूजा करना।


🕉 धार्मिक अर्थ

ब्राह्मण भोजन: धर्म के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक।

वस्त्र दान: देव ऊर्जा को स्थिर करने का साधन।

प्रदोष पूजा: कालमहिमा की अनुभूति।

शिव पूजा: अधोगामी शक्तियों के विनाश हेतु आभार प्रकट करना।


नरक चतुर्दशी का त्योहार अंधकार पर प्रकाश और नकारात्मकता पर सकारात्मकता की विजय का प्रतीक है।

संदर्भ: सनातन संस्था वेबसाइट – sanatan.org

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